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कावरियो के बिना सुना-सुना जिले के शिव-धाम

कावरियो के बिना सुना-सुना जिले के शिव-धाम

Published: 15 Jul, 2020

 कवर्धा - शिव भक्ति का विशेष पर्व सावन माह को माना जाता है, इस माह में शिव भक्त बेल पत्र पंचामृत आदि से पूजा कर भगवन शिव को प्रसन्न कारते है, प्रति वर्ष जिले में हजारो की तादात में अमरकंटक से नर्मदा नदी के उदगम से जल लेकर जिले का प्रमुख रूप से डोगरिया महादेव घाट पांडातराई,बुढा महादेव कवर्धा व भोरमदेव मंदिरों में सावन माह के प्रारम्भ से पुरे माह भर विशेष रूप से  सोमवार को विशेष रूप से पूजा के लिए श्रधालुवो का ताता लगा रहता था।

लेकिन इस वर्ष कोरोना के चलते भोरमदेव मंदिर के बंद होने और किसी भी धार्मिक आयोजन में रोक के चलते अन्य त्योहारों की तरह शिव भक्तो का विशेष पर्व सावन माह भी अधूरी और शूनी रह गई है ।

सावन मास को सर्वोत्तम मास कहा जाता है। यह 5 पौराणिक तथ्य बताते हैं कि क्यों सावन है सबसे खास... 

 

1. मरकंडू ऋषि के पुत्र मारकण्डेय ने लंबी आयु के लिए सावन माह में ही घोर तप कर शिव की कृपा प्राप्त की थी, जिससे मिली मंत्र शक्तियों के सामने मृत्यु के देवता यमराज भी नतमस्तक हो गए थे।

 

2. भगवान शिव को सावन का महीना प्रिय होने का अन्य कारण यह भी है कि भगवान शिव सावन के महीने में पृथ्वी पर अवतरित होकर अपनी ससुराल गए थे और वहां उनका स्वागत अर्घ्य और जलाभिषेक से किया गया था। माना जाता है कि प्रत्येक वर्ष सावन माह में भगवान शिव अपनी ससुराल आते हैं। भू-लोक वासियों के लिए शिव कृपा पाने का यह उत्तम समय होता है।

  3. पौराणिक कथाओं में वर्णन आता है कि इसी सावन मास में समुद्र मंथन किया गया था। समुद्र मथने के बाद जो हलाहल विष निकला, उसे भगवान शंकर ने कंठ में समाहित कर सृष्टि की रक्षा की; लेकिन विषपान से महादेव का कंठ नीलवर्ण हो गया। इसी से उनका नाम 'नीलकंठ महादेव' पड़ा। विष के प्रभाव को कम करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया। इसलिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने का ख़ास महत्व है। यही वजह है कि श्रावण मास में भोले को जल चढ़ाने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। 

 

4. 'शिवपुराण' में उल्लेख है कि भगवान शिव स्वयं ही जल हैं। इसलिए जल से उनकी अभिषेक के रूप में अराधना का उत्तमोत्तम फल है, जिसमें कोई संशय नहीं है।

 

5. शास्त्रों में वर्णित है कि सावन महीने में भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसलिए ये समय भक्तों, साधु-संतों सभी के लिए अमूल्य होता है। यह चार महीनों में होने वाला एक वैदिक यज्ञ है, जो एक प्रकार का पौराणिक व्रत है, जिसे 'चौमासा' भी कहा जाता है; तत्पश्चात सृष्टि के संचालन का उत्तरदायित्व भगवान शिव ग्रहण करते हैं। इसलिए सावन के प्रधान देवता भगवान शिव बन जाते हैं।

 


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